नमस्ते मेरे प्यारे रीडर्स! आज हम एक ऐसे देश के बारे में बात करने वाले हैं जिसके बारे में बहुत सी बातें रहस्यमयी मानी जाती हैं – जी हाँ, मैं उत्तरी कोरिया की बात कर रही हूँ.
क्या आपने कभी सोचा है कि वहाँ के लोग कहाँ और कैसे रहते होंगे, खासकर शहरों और गाँवों में उनका जीवन कितना अलग है? मैंने खुद इस पर काफी छानबीन की है और पाया है कि यह विषय सिर्फ़ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि वहाँ के हर इंसान की रोज़मर्रा की कहानियों से जुड़ा है.
इस दिलचस्प पहलू को करीब से समझना वाकई आँखें खोल देने वाला अनुभव है. तो आइए, आज इसी गहराई में उतरकर देखते हैं कि कैसे उत्तरी कोरिया की जनसंख्या शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बंटी हुई है और इसके पीछे क्या-क्या दिलचस्प वजहें हैं.
चलिए, इस रहस्यमयी दुनिया की सच्चाई को करीब से समझते हैं!
नमस्ते दोस्तों! उत्तरी कोरिया, नाम सुनते ही दिमाग में एक रहस्यमयी दुनिया की तस्वीर उभर आती है. मैंने हमेशा सोचा है कि आखिर वहाँ के लोग कैसे जीते होंगे?
क्या शहरी और ग्रामीण जीवन में वाकई इतना बड़ा अंतर है जितना हम सोचते हैं? मेरी छानबीन ने मुझे कुछ ऐसी बातें बताई हैं जो सचमुच चौंकाने वाली हैं और मुझे लगता है कि आपको भी ये सब जानना चाहिए.
तो चलिए, आज इसी पर खुलकर बात करते हैं.
राजधानी की चकाचौंध और बाक़ी दुनिया का संघर्ष

प्योंगयांग में आधुनिकता का दिखावा
अगर आप सोचते हैं कि उत्तरी कोरिया में सब कुछ पिछड़ा हुआ है, तो एक बार प्योंगयांग की तस्वीरें देखिए. यह शहर किसी भी आधुनिक राजधानी से कम नहीं दिखता. ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, और व्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन – ये सब देखकर तो एक बार को यकीन ही नहीं होता कि यह वही देश है जिसके बारे में इतनी कड़वी बातें कही जाती हैं.
मैंने पढ़ा है कि प्योंगयांग को बहुत योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया गया है. यहाँ सरकार अपने सबसे वफादार और कुलीन वर्ग के लोगों को रखती है, ताकि दुनिया को एक ‘आदर्श’ उत्तरी कोरियाई जीवनशैली का उदाहरण दिखाया जा सके.
सड़कों पर गाड़ियाँ कम दिखती हैं, लेकिन साफ-सफाई और अनुशासन कमाल का होता है. यहाँ के अपार्टमेंट्स में भी बाकी शहरों के मुकाबले ज़्यादा सुविधाएँ होती हैं.
हालाँकि, मेरे जैसे आम इंसान के लिए ये सब देखना और समझना मुश्किल है कि इस चकाचौंध के पीछे कितनी सच्चाई है और कितने पर्दे लगे हुए हैं. लेकिन एक बात तो तय है, प्योंगयांग का जीवन बाकी उत्तरी कोरिया से बिलकुल अलग है.
ग्रामीण इलाकों का कठोर यथार्थ
प्योंगयांग की चमक से दूर, उत्तरी कोरिया के ग्रामीण इलाके एक बिलकुल अलग तस्वीर पेश करते हैं. यहाँ का जीवन संघर्षों से भरा है, और यह बात कई रिपोर्ट्स में सामने आई है.
मैंने देखा है कि गाँवों में आज भी खेती के लिए आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल न के बराबर होता है, और लोग हाथों से ही सारे काम करते हैं. यह पढ़कर दिल दुखता है कि इक्कीसवीं सदी में भी लोगों को इतनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए जूझना पड़ रहा है.
इन इलाकों में बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी पर्याप्त नहीं होतीं. सड़कें खाली-खाली दिखती हैं और मोबाइल टावर जैसी आधुनिक संचार सुविधाओं का तो नामोनिशान भी नहीं होता.
इन गाँवों की तस्वीरें देखकर लगता है जैसे समय थम सा गया हो. मुझे लगता है कि सरकार का पूरा ध्यान सिर्फ प्योंगयांग को सजाने-संवारने पर रहता है, जबकि देश के बाकी हिस्से अपनी किस्मत पर छोड़ दिए गए हैं.
गाँव के लोग दुनिया से कटे हुए, सूचनाओं के अभाव में जीने को मजबूर हैं, जो वाकई एक दुखद हकीकत है.
जीवनशैली के गहरे अंतर: शहरी और ग्रामीण
शहरी जीवन की सुविधाएँ और दबाव
शहरों में, खासकर प्योंगयांग में, जीवन थोड़ा व्यवस्थित दिखता है. सरकारी नौकरशाह, सैन्य अधिकारी और कुछ खास पेशेवर यहाँ रहते हैं. उन्हें सरकारी आवास, बिजली और कुछ हद तक बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलती हैं.
मुझे लगता है कि यह सब एक सुनियोजित प्रदर्शन का हिस्सा है. शहरी लोग अक्सर सार्वजनिक परिवहन, जैसे ट्राम और बसों का इस्तेमाल करते हैं. हालाँकि, यहाँ भी आम नागरिक अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कर सकते.
कौन कहाँ रहेगा, कौन क्या काम करेगा, ये सब सरकार तय करती है. मुझे तो यह सोचकर ही घुटन होती है कि अपने जीवन के छोटे-छोटे फैसले भी खुद न ले पाना कैसा लगता होगा.
शहरों में भी लोगों को लगातार निगरानी में रखा जाता है, और बाहरी दुनिया से आने वाली सूचनाओं पर सख्त पाबंदी होती है. मेरा मानना है कि ये सारी ‘सुविधाएँ’ एक बड़े पिंजरे जैसी हैं, जिसमें लोग भले ही पेट भर लें, पर आज़ादी की साँस नहीं ले सकते.
ग्रामीण जीवन की चुनौतियाँ और धैर्य
गाँवों में ज़िंदगी बहुत मुश्किल है. यहाँ के लोग मुख्य रूप से खेती पर निर्भर करते हैं, लेकिन आधुनिक तकनीक और संसाधनों की कमी से जूझते हैं. मुझे हमेशा से ग्रामीण जीवन में एक सादगी और सुकून दिखा है, लेकिन उत्तरी कोरिया के गाँवों की बात अलग है.
यहाँ लोगों को खाने-पीने की चीज़ें जुटाने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है. मैंने पढ़ा है कि 1990 के दशक में उत्तरी कोरिया में भीषण अकाल पड़ा था, और आज भी देश खाद्य उत्पादन में संघर्ष कर रहा है.
मेरे दिल को छू जाने वाली बात यह है कि इन सारी मुश्किलों के बावजूद, ग्रामीण लोग शायद एक अजीब से धैर्य के साथ जीते हैं, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं होता.
न इंटरनेट है, न सोशल मीडिया, न बाहरी दुनिया से कोई संपर्क. वे बस अपनी छोटी सी दुनिया में, सरकार के बनाए नियमों के दायरे में रहकर जीवन गुज़ारते हैं.
सरकार की नीतियाँ और जनसंख्या पर नियंत्रण
सॉन्गबून व्यवस्था का शिकंजा
उत्तरी कोरिया में ‘सॉन्गबून’ नाम की एक सामाजिक-राजनीतिक प्रणाली है, जो लोगों के जीवन को जन्म से ही तय कर देती है. यह प्रणाली बताती है कि कोई व्यक्ति कितना वफादार है और उसके परिवार का इतिहास कैसा रहा है.
मेरे लिए यह समझना बहुत मुश्किल है कि कोई सरकार अपने नागरिकों को उनके जन्म के आधार पर कैसे बाँट सकती है. यह व्यवस्था तय करती है कि आपको कौन सी शिक्षा मिलेगी, कहाँ रहने को मिलेगा, और किस तरह का काम मिलेगा.
मुझे लगता है कि यह लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी पर सबसे बड़ा हमला है. सॉन्गबून के आधार पर लोगों को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है: ‘कोर’, ‘हैवरिंग’ और ‘होस्टाइल’.
कोर श्रेणी के लोगों को प्योंगयांग में रहने और बेहतर सुविधाओं का लाभ उठाने का मौका मिलता है, जबकि निचले तबके के लोग ग्रामीण इलाकों में संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर होते हैं.
इस व्यवस्था ने पूरे समाज में गहरी खाई खोद दी है, जहाँ एक ही देश के नागरिक होते हुए भी उनके अधिकार और अवसर बिलकुल अलग हैं.
शहरीकरण पर सख्त लगाम
उत्तरी कोरिया में सरकार शहरों, खासकर प्योंगयांग में, आबादी के प्रवाह को बहुत सख्ती से नियंत्रित करती है. आम लोग अपनी मर्ज़ी से कहीं भी जाकर बस नहीं सकते.
मुझे तो यह सुनकर ही अजीब लगता है कि अपने ही देश में घूमने या रहने के लिए भी सरकार की इजाज़त चाहिए. इस नियंत्रण का एक बड़ा कारण प्योंगयांग की ‘आदर्श’ छवि को बनाए रखना है.
सरकार नहीं चाहती कि ग्रामीण इलाकों की गरीबी और अभाव शहरों में साफ-साफ दिखें. इसीलिए केवल उन लोगों को शहरों में बसने की अनुमति मिलती है जो सरकार की नज़र में ‘भरोसेमंद’ होते हैं या जिनके पास कोई विशेष कौशल होता है.
इसके पीछे एक सुरक्षा पहलू भी हो सकता है, ताकि शहरों में भीड़भाड़ न बढ़े और निगरानी करना आसान हो. मुझे लगता है कि यह व्यवस्था लोगों के प्राकृतिक विकास और आज़ादी को पूरी तरह कुचल देती है, उन्हें मजबूर करती है कि वे जहाँ हैं, वहीं रहें, भले ही उनकी ज़िंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो.
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ: पहुँच और गुणवत्ता
शिक्षण संस्थानों तक पहुँच का अंतर
उत्तरी कोरिया में शिक्षा ‘मुफ्त’ होने का दावा किया जाता है, लेकिन इसकी पहुँच और गुणवत्ता में शहरी और ग्रामीण इलाकों में ज़मीन-आसमान का फर्क है. प्योंगयांग जैसे शहरों में स्कूल और विश्वविद्यालय बेहतर सुविधाओं वाले होते हैं, जहाँ छात्रों को अच्छी शिक्षा मिलने की संभावना ज़्यादा होती है.
वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की हालत अक्सर खराब होती है, शिक्षकों की कमी होती है और पढ़ाई के संसाधन भी बहुत कम होते हैं. मुझे तो यह बात खटकती है कि जब शिक्षा का अधिकार सबको मिलना चाहिए, तो यह अंतर क्यों?
मैंने हमेशा से माना है कि शिक्षा ही किसी भी समाज की नींव होती है, और जब उस नींव में ही असमानता हो, तो समाज कैसे आगे बढ़ पाएगा? शहरी बच्चों को जहाँ बेहतर भविष्य के सपने देखने का मौका मिलता है, वहीं ग्रामीण बच्चों का भविष्य अक्सर अनिश्चितताओं से घिरा रहता है.
स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और चुनौतियाँ

स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भी उत्तरी कोरिया में ‘मुफ्त’ होने का दावा किया जाता है, लेकिन इसकी हकीकत काफी अलग है. शहरों में, खासकर प्योंगयांग में, कुछ अच्छे अस्पताल और क्लीनिक हैं, जहाँ विशेषज्ञ डॉक्टर और दवाएँ उपलब्ध हो सकती हैं.
हालाँकि, यहाँ भी बिजली की कमी जैसी समस्याएँ सामने आती हैं, जिससे आधुनिक उपकरण बेकार हो जाते हैं. ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएँ बहुत सीमित हैं.
दवाएँ अक्सर अनुपलब्ध होती हैं, और डॉक्टरों की भारी कमी रहती है. मेरे लिए यह सोचना भी मुश्किल है कि बीमारियों में इलाज के लिए लोगों को कितना भटकना पड़ता होगा.
1990 के दशक से उत्तरी कोरिया की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को प्राकृतिक आपदाओं और आर्थिक समस्याओं के कारण भारी गिरावट का सामना करना पड़ा है. मुझे लगता है कि जब एक सरकार अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाती, तो यह एक बड़ी मानवीय त्रासदी है.
बाहरी दुनिया से कटे लोग: सूचना का अभाव
सूचना का नियंत्रित प्रवाह: सच और झूठ
उत्तरी कोरिया में लोगों को बाहरी दुनिया से मिलने वाली सूचनाओं पर बहुत सख्त नियंत्रण रहता है. इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसी चीज़ें आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं हैं.
मुझे हमेशा से यह लगा है कि सूचना ही शक्ति है, और जब लोगों को सच से दूर रखा जाता है, तो वे कभी भी अपनी पूरी क्षमता का एहसास नहीं कर पाते. सरकार केवल वही जानकारी लोगों तक पहुँचने देती है जो उसकी विचारधारा के अनुरूप होती है, और यही कारण है कि लोगों को अक्सर अपने ही देश की असली स्थिति का पूरा अंदाज़ा नहीं होता.
मैंने ऐसे कई किस्से पढ़े हैं जहाँ बाहरी फिल्में देखने या गाने सुनने पर लोगों को कड़ी सज़ा मिली है. यह जानकर मेरा दिल दहल जाता है कि लोग इतनी पाबंदियों के बीच जीते हैं.
मुझे लगता है कि यह लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने जैसा है, जहाँ उनकी सोच और विचारों पर भी सरकार का ही कब्ज़ा होता है.
दुनिया से कटे रहने का मानसिक प्रभाव
लगातार बाहरी दुनिया से कटे रहने का मानसिक प्रभाव बहुत गहरा होता है. जब आपको पता ही न हो कि दुनिया में क्या चल रहा है, तो आपकी सोच भी सीमित हो जाती है.
मुझे लगता है कि यह लोगों की रचनात्मकता और जिज्ञासा को खत्म कर देता है. वे एक ही तरह की विचारधारा और प्रचार के बीच पलते-बढ़ते हैं, जिससे उनमें सवाल करने की क्षमता कम हो जाती है.
यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि पूरे समाज के लिए हानिकारक है. लोग अपनी आज़ादी और अधिकारों के बारे में कभी जान ही नहीं पाते, और उन्हें लगता है कि उनका जीवन जैसा है, वही सामान्य है.
यह सब मुझे बहुत दुख देता है, क्योंकि हर इंसान को अपने विचारों और दुनिया को जानने का पूरा अधिकार है. मुझे उम्मीद है कि एक दिन यह स्थिति बदलेगी और उत्तरी कोरिया के लोगों को भी पूरी दुनिया देखने और समझने का मौका मिलेगा.
आर्थिक गतिविधियाँ और रोज़गार के अवसर
राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था में काम
उत्तरी कोरिया एक केंद्रीय नियोजित अर्थव्यवस्था है, जहाँ सरकार हर आर्थिक गतिविधि को नियंत्रित करती है. मेरे लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि एक ऐसी जगह जहाँ बाज़ार की आज़ादी न हो, लोग कैसे अपनी रोज़ी-रोटी कमाते होंगे.
यहाँ अधिकांश लोग राज्य-नियंत्रित उद्यमों या सामूहिक खेतों में काम करते हैं. रोज़गार के अवसर अक्सर व्यक्ति के सॉन्गबून (सामाजिक वर्ग) और सरकारी प्राथमिकताओं के आधार पर तय किए जाते हैं.
मुझे लगता है कि यह प्रणाली लोगों की उद्यमशीलता और नवाचार को दबा देती है, क्योंकि उन्हें अपनी पसंद का काम चुनने की आज़ादी नहीं होती. कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोज़गार का वितरण भी राज्य द्वारा ही निर्धारित होता है.
हालांकि, 1990 के दशक से अनौपचारिक बाज़ार, जिन्हें ‘जंगमाडांग’ कहा जाता है, बढ़े हैं, जहाँ लोग अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए कुछ हद तक व्यापार करते हैं.
यह दिखाता है कि इंसान किसी न किसी तरह से अपनी ज़रूरतों को पूरा करने का रास्ता ढूंढ ही लेता है.
खेती और उद्योग: शहरी-ग्रामीण रोज़गार
रोज़गार के अवसर शहरी और ग्रामीण इलाकों में काफी अलग हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में, अधिकांश आबादी खेती से जुड़ी है, जिसमें चावल, मक्का और आलू जैसी फसलें उगाना शामिल है.
मैंने देखा है कि ग्रामीण लोग अक्सर हाथ से काम करते हैं, क्योंकि मशीनीकरण बहुत कम है. वहीं, शहरों में उद्योग और सेवा क्षेत्र में ज़्यादा लोग काम करते हैं.
उत्तरी कोरिया की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा सैन्य उत्पाद, मशीन निर्माण, कोयला और धातुओं के खनन से आता है. मुझे लगता है कि सरकार का मुख्य ध्यान सैन्य विकास पर रहता है, जिसे ‘सोंगुन नीति’ (मिलिटरी फर्स्ट) कहा जाता है.
इस नीति के चलते संसाधनों का बड़ा हिस्सा सेना और उससे जुड़े उद्योगों में चला जाता है, जिसका सीधा असर आम नागरिकों की रोज़गार और जीवनशैली पर पड़ता है. शहरों में कुछ हद तक सरकारी दफ्तरों और कारखानों में काम मिलता है, जबकि गाँवों में लोगों के पास खेती के अलावा ज़्यादा विकल्प नहीं होते.
| विशेषता | शहरी क्षेत्र (मुख्यतः प्योंगयांग) | ग्रामीण क्षेत्र |
|---|---|---|
| जीवनशैली | अधिक व्यवस्थित, कुछ हद तक आधुनिक सुविधाएँ, सीमित आज़ादी। | संघर्षपूर्ण, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, कठोर जीवन। |
| आवास | सरकारी अपार्टमेंट, बेहतर गुणवत्ता। | बुनियादी घर, अक्सर सुविधाओं की कमी। |
| शिक्षा | बेहतर स्कूल और विश्वविद्यालय, अधिक संसाधन। | सीमित संसाधन, खराब शैक्षणिक ढाँचा। |
| स्वास्थ्य सेवाएँ | कुछ अच्छे अस्पताल, विशेषज्ञ डॉक्टर (सीमित बिजली)। | बुनियादी क्लीनिक, दवाएँ और डॉक्टरों की भारी कमी। |
| रोज़गार | उद्योग, सरकारी नौकरी, सेवा क्षेत्र। | मुख्यतः कृषि (हाथों से खेती), खनन। |
| सूचना तक पहुँच | अत्यंत नियंत्रित, बाहरी दुनिया से कटाव। | लगभग न के बराबर, पूरी तरह राज्य-नियंत्रित। |
| बुनियादी ढाँचा | चौड़ी सड़कें, व्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन (प्योंगयांग)। | कच्ची सड़कें, बिजली और पानी की भारी कमी। |
निष्कर्ष
दोस्तों, उत्तरी कोरिया के शहरी और ग्रामीण जीवन के इस सफ़र में, मैंने जो कुछ भी जाना और समझा है, उससे मन में एक अजीब सी भावना उठती है. प्योंगयांग की चमक-दमक और गाँवों के संघर्ष के बीच का ये विरोधाभास किसी भी संवेदनशील इंसान को सोचने पर मजबूर कर देगा. मुझे लगता है कि यह सिर्फ सुविधाओं का अंतर नहीं है, बल्कि आज़ादी, अवसर और बुनियादी मानवीय अधिकारों का भी है. एक ही देश में रहकर भी लोगों की ज़िंदगी में इतना बड़ा फ़र्क होना, ये दिखाता है कि वहाँ की व्यवस्था किस तरह लोगों को अलग-अलग साँचे में ढालती है. यह केवल एक भौगोलिक विभाजन नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता की एक गहरी खाई है, जिसे सरकार की नीतियाँ लगातार बढ़ाती जा रही हैं. मेरे लिए यह समझना बेहद ज़रूरी था कि ऐसी व्यवस्था में लोग कैसे अपने जीवन को आगे बढ़ाते हैं, और इस पड़ताल से हमें एक ऐसी दुनिया का पता चलता है जहाँ हर पहलू पर नियंत्रण होता है. इस जानकारी को आप तक पहुँचाना मेरा मकसद था, ताकि आप भी इस जटिल वास्तविकता के विभिन्न पहलुओं को समझ सकें और इस पर अपनी राय बना सकें.
कुछ काम की बातें जो आपको जाननी चाहिए
1. उत्तरी कोरिया में ‘सोंगबून’ प्रणाली लोगों के जन्म के आधार पर उनके सामाजिक वर्ग को तय करती है, जिससे उनकी शिक्षा, नौकरी और रहने की जगह भी प्रभावित होती है. यह एक ऐसा वर्गीकरण है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है और जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करता है, जिससे व्यक्तिगत प्रगति और आज़ादी पर सीधा असर पड़ता है.
2. बाहरी दुनिया से संचार के माध्यमों पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है. इंटरनेट, विदेशी रेडियो या फिल्में देखना एक गंभीर अपराध माना जाता है, जिसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है. यह लोगों को दुनिया भर की जानकारी और विकास से पूरी तरह अलग-थलग कर देता है, जिससे उनकी सोच और समझ भी सीमित रह जाती है.
3. प्योंगयांग, राजधानी शहर होने के नाते, सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है. इसे एक आदर्श समाजवादी शहर के रूप में दिखाया जाता है, जहाँ बेहतर सुविधाएँ और आधुनिकता का प्रदर्शन किया जाता है. इसके पीछे का मकसद यह है कि दुनिया को एक ‘आदर्श’ उत्तरी कोरियाई जीवनशैली का उदाहरण दिखाया जा सके, जबकि ग्रामीण इलाकों की स्थिति अक्सर दुनिया से छिपी रहती है.
4. उत्तरी कोरियाई अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से राज्य-नियंत्रित है, जिसमें व्यक्तिगत उद्यमशीलता के लिए बहुत कम जगह है. हालांकि, 1990 के दशक से अनौपचारिक बाज़ार, जिन्हें ‘जंगमाडांग’ कहा जाता है, बढ़े हैं. ये बाज़ार लोगों को अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं और दिखाते हैं कि मुश्किल हालातों में भी लोग अपनी ज़रूरतों को पूरा करने का रास्ता ढूंढ ही लेते हैं.
5. सैन्य ताकत पर उत्तरी कोरिया का विशेष ज़ोर, जिसे ‘सोंगुन नीति’ (मिलिटरी फर्स्ट) कहा जाता है, देश के संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा सैन्य क्षेत्र में मोड़ देता है. इसका सीधा असर आम नागरिकों की रोज़गार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर पड़ता है, जिससे देश के विकास में असंतुलन पैदा होता है और सामान्य जनता का जीवन और भी कठिन हो जाता है.
मुख्य बातें एक नज़र में
उत्तरी कोरिया में शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच एक गहरी खाई है, जिसका मुख्य कारण सरकार की केंद्रीकृत नीतियाँ हैं. जहाँ प्योंगयांग एक आधुनिक और व्यवस्थित शहर का भ्रम पैदा करता है, वहीं देश के अधिकांश ग्रामीण इलाके मूलभूत सुविधाओं और अवसरों के अभाव में जीवन जीते हैं. ‘सोंगबून’ व्यवस्था, सूचना का कठोर नियंत्रण, और शहरीकरण पर लगाम जैसी नीतियाँ नागरिकों की आज़ादी और विकास को बाधित करती हैं, जिससे उन्हें अपनी पसंद का जीवन जीने का अवसर नहीं मिल पाता. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ भी इन दो क्षेत्रों में असमान रूप से वितरित हैं, जिससे शहरी निवासियों को कुछ हद तक बेहतर सुविधाएँ मिलती हैं, जबकि ग्रामीण आबादी संघर्ष करती है और बुनियादी ज़रूरतों के लिए जूझती है. अर्थव्यवस्था राज्य-नियंत्रित होने के कारण व्यक्तिगत आज़ादी और उद्यमशीलता का अभाव है, जिससे लोग अपनी पसंद का काम नहीं चुन पाते. कुल मिलाकर, उत्तरी कोरिया का सामाजिक ताना-बाना सरकार के पूर्ण नियंत्रण में है, जो हर नागरिक के जीवन को उसकी जन्मभूमि और सामाजिक वर्ग के आधार पर तय करता है. यह स्थिति मानवीय विकास और आज़ादी के लिए एक बड़ी चुनौती है, और मुझे उम्मीद है कि भविष्य में लोगों को एक बेहतर और संतुलित जीवन जीने का अवसर मिलेगा, जहाँ वे अपनी पूरी क्षमता का एहसास कर सकें.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖
प्र: उत्तरी कोरिया में शहरी और ग्रामीण जनसंख्या का वितरण कैसा है और ज़्यादातर लोग कहाँ रहना पसंद करते हैं?
उ: अरे वाह, यह एक ऐसा सवाल है जो मुझे भी हमेशा सोचने पर मजबूर करता है! आंकड़ों की बात करें तो, उत्तरी कोरिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरों में रहता है.
2024 के अनुमानों के मुताबिक, वहाँ की कुल जनसंख्या लगभग 2.5 करोड़ है. दिलचस्प बात यह है कि शहरीकरण की प्रक्रिया 1953 से 1960 के बीच सबसे तेज़ी से हुई थी, जब शहरी आबादी में हर साल 12 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी.
इसके बाद इसमें थोड़ी कमी आई, लेकिन अब फिर से यह तेज़ी पकड़ रही है और 2041 तक 70% से ज़्यादा और 2050 तक 74.2% तक पहुँचने की उम्मीद है. लोग प्योंगयांग जैसे बड़े शहरों में ज़्यादा रहते हैं, क्योंकि वहाँ उन्हें काम के बेहतर अवसर मिलते हैं और सरकार की तरफ से भी सुविधाएँ ज़्यादा होती हैं.
मैंने खुद देखा है कि कैसे प्योंगयांग में लोगों की लाइफस्टाइल बाकी गाँवों से थोड़ी अलग दिखती है, कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता है. दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में, जहाँ समतल भूमि और कम ऊँचाई है, वहाँ जनसंख्या ज़्यादा केंद्रित है.
प्योंगयांग के आसपास और दक्षिण प्योंगान प्रांत में जनसंख्या घनत्व सबसे ज़्यादा है. चीन की सीमा से लगे सिनुइजू और अंतर-कोरियाई औद्योगिक परिसर वाले कैसॉन्ग जैसे शहरों में भी काफी भीड़भाड़ रहती है.
वहीं, उत्तर-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में (जैसे जगंग, रयांगगैंग, उत्तर हमग्योंग) आबादी थोड़ी कम देखने को मिलती है. यह सब देखकर मुझे लगता है कि हर इंसान की तलाश आखिर में बेहतर ज़िंदगी और सुविधाओं की ही होती है, चाहे वह किसी भी देश में क्यों न हो.
प्र: उत्तरी कोरिया में जनसंख्या के शहरी और ग्रामीण वितरण को कौन-कौन से मुख्य कारक प्रभावित करते हैं?
उ: यह सवाल वाकई में इस देश की नीतियों और लोगों की ज़िंदगी के बारे में बहुत कुछ बताता है. मेरे अनुभव से, उत्तरी कोरिया में जनसंख्या वितरण को कई अहम कारक प्रभावित करते हैं, जिनमें सरकारी नीतियाँ और आर्थिक हालात सबसे ऊपर हैं.
सबसे पहले, सरकार का औद्योगिकरण पर ज़ोर देना एक बहुत बड़ा कारण रहा है. आज़ादी के बाद से ही, उत्तरी कोरिया ने उद्योगों के विकास पर काफी ध्यान दिया, जिसकी वजह से शहरों में नौकरियाँ बढ़ीं और लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे.
दूसरा, संसाधनों तक पहुँच भी एक बड़ा फैक्टर है. जहाँ पानी, उपजाऊ ज़मीन और खनिज संसाधन ज़्यादा होते हैं, वहाँ आबादी भी ज़्यादा दिखती है. जैसे कि मैंने बताया, दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में जहाँ मैदानी इलाके हैं, वहाँ लोग ज़्यादा बसते हैं.
इसके अलावा, यह भी एक सच्चाई है कि उत्तरी कोरिया में लोगों की आवाजाही पर सरकार का कड़ा नियंत्रण होता है. लोग अपनी मर्ज़ी से कहीं भी जाकर बस नहीं सकते. उन्हें सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है, और अक्सर यह अनुमति तभी मिलती है जब सरकार को किसी खास इलाके में श्रम बल की ज़रूरत हो.
मैंने कई रिपोर्टों में पढ़ा है कि प्योंगयांग जैसे बड़े शहरों में रहने के लिए खास तरह की अनुमति और वफादारी की ज़रूरत होती है. यह सब मिलकर ही तय करता है कि कौन कहाँ रहेगा और कैसे अपनी ज़िंदगी जिएगा.
ये सारे कारक एक साथ मिलकर उत्तरी कोरिया के शहरी और ग्रामीण परिदृश्य को आकार देते हैं.
प्र: उत्तरी कोरिया के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन में क्या खास अंतर होते हैं?
उ: इस सवाल का जवाब मेरे दिल को छू जाता है, क्योंकि यह सीधे-सीधे लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा है. शहरी और ग्रामीण जीवन में अंतर सिर्फ़ सड़कों और इमारतों का नहीं, बल्कि सुविधाओं, अवसरों और यहाँ तक कि लोगों की सोच का भी होता है.
मैंने जो पढ़ा और समझा है, उसके हिसाब से, प्योंगयांग जैसे बड़े शहरों में रहने वाले लोगों को कुछ हद तक बेहतर सुविधाएँ मिलती हैं. वहाँ बिजली, पानी और सार्वजनिक परिवहन की सुविधाएँ गाँवों की तुलना में बेहतर होती हैं.
शहरों में स्कूल और अस्पताल भी गाँवों के मुकाबले ज़्यादा और अच्छे होते हैं. मैंने देखा है कि शहरी इलाकों में कुछ हद तक आधुनिकता की झलक दिखती है, भले ही वह सीमित ही क्यों न हो.
वहाँ के लोग भी थोड़े ज़्यादा ‘खुले’ या शायद कम ‘दबे हुए’ लगते हैं, लेकिन यह सिर्फ़ मेरा अनुमान है. वहीं, ग्रामीण इलाकों में ज़िंदगी काफी मुश्किल होती है.
वहाँ के लोग मुख्य रूप से खेती-बाड़ी पर निर्भर होते हैं. मैंने पढ़ा है कि गाँवों में मूलभूत सुविधाओं जैसे बिजली और पीने के पानी की कमी होती है. वहाँ के घर भी शहरों के मुकाबले काफी साधारण होते हैं और अक्सर मिट्टी या लकड़ी के बने होते हैं.
सबसे बड़ा अंतर शायद आज़ादी में है. शहरों में भी नियंत्रण है, लेकिन गाँवों में लोगों को अक्सर अपने खेतों तक ही सीमित रहना पड़ता है. उन्हें बाहर निकलने या दूसरी जगहों पर जाने के लिए भी मुश्किल से ही अनुमति मिलती है.
मुझे लगता है कि यह अंतर हर इंसान के सपने और आकांक्षाओं पर भी असर डालता होगा. शहरी बच्चे शायद बेहतर भविष्य का सपना देखते हों, जबकि ग्रामीण बच्चों को अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने की चिंता ज़्यादा सताती होगी.
यह फर्क सिर्फ़ दूरी का नहीं, बल्कि पूरे जीवनशैली का है.






